आशा से परिपूर्ण और रोचक, सहज उपन्यास
"सुबह के लिए"
-डा.पूर्णिमा मौर्या
‘‘यानी सरकार ने जानबूझकर एक ही बिरादरी के लोगों को एक जगह बसा दिया? सरकार भी जातिवाद, भेदभाव को बढ़ावा देती है। क्यों न दे, उसमें भी तो ब्राह्मणवाद के पोषक लोग बैठे हैं।’’ (पृ.32)
यह पंक्तियां हैं कैलाश चन्द चौहान के पहले उपन्यास ‘सुबह के लिए’ की। यह उपन्यास जाति, धर्म, वर्ग, लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव को उजागर करता ही है, साथ ही दलित समाज के भीतर की कमजोरियों अंधविश्वास को भी सामने लाता है। दलितों में भी अति दलित मानी जाने वाली जाति वाल्मीकि जिसमें ज्यादातर लोग सफ़ाई कर्मचारी हैं, के जीवन की समस्याओं को उजागर करता है। सरकार की लापरवाही व अनदेखी के चलते ये समस्याएं विकराल रूप धारण कर लेती हैं तथा कभी-कभी उनकी मौतों का कारण भी बन जाती हैं। यही यही नहीं मृत्यु के बाद भी ‘नेतागण’ सफ़ाई कर्मचारियों से केवल दिखावटी संवेदना प्रकट कर किस तरह अपनी राजनीति चमकाते हैं। इसका भी पर्दाफाश यहां किया गया है।
यह उपन्यास कुछ घटनाओं को आधार बनाकर रचा गया है। इन्हीं घटनाओं के इर्द-गिर्द रचनाकार ने बड़ी कुशलता से दलित समाज पर होने वाले अत्याचार स्त्री और दलित स्त्री के जीवन के संघर्षों, समस्याओं को रखते हुए गांव से शहर तक की यात्रा की है! ‘सोनी’ जो कि एक सवर्ण स्त्री है। एक सुन्दर-सुघड़ घरेलू औरत लेकिन शादी के तीन-चार साल बाद भी मां न बनने पर घर-परिवार से लेकर पास-पड़ोस तक सबके तानों से दो-चार होते हुए बांझ मान ली जाती हंै। उसे झांड-फूंक से लेकर पाखंडी बाबा तक के पास ले जाया गया। अंत में डाॅक्टरी जांच द्वारा उसके पति में कमी पाए जाने की बात सोनी को पता लगती है और अपने पर लगे ‘बांझ’ के कलंक मिटाने के लिए ‘काले’ जो कि दलित जाति से संबंध बनाकर मां बन जाती है। लेखक कहता है, ‘‘पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों की पहचान का मुख्य आधार क्या है? संतानोत्पत्ति...उसके अस्तित्व पर तब खतरा मंडराने लगता है जब वह संतान उत्पन्न करने में असमर्थ होती है।’’
यहां यह बात ध्यान देने वाली है कि डाॅक्टरी जांच के बाद सोनी के पति बलदेव सिंह में शुक्राणुओं की कमी की बात दोनों में से कोई भी घरवालों को नहीं बताता। जिस बात को लेखक स्त्री अस्तित्व से जोड़ता है। उसका संबंध ही स्त्री पात्र सोनी से नहीं बल्कि पुरुष से है, जिसे सोनी भी छिपा लेती है और अन्य पुरुष से मां बनने का सुख प्राप्त करती है। जो मातृत्व सुख से अधिक बांझपन के कलंक से मुक्ति का प्रतीत होता है।
उधर दलित पात्र ‘काले’ जो सोनी के पुत्र का पिता भी हे इसी बात से प्रसन्न है कि, ‘‘मेरा बेटा, बड़े लोगों के घर पलेगा और बढ़ेगा! नाम भी उसे जमींदारों का मिलेगा। वह कभी किसी से इस बात की न तो चर्चा करता है और न ही कभी सोनी को ब्लैक मेल करने का प्रयास ही करता है।
दूसरी तरफ शहर में सफ़ाई कर्मचारी लक्ष्मी पर इंस्पेक्टनर दहिया बुरी नज़र रखता है, और अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए षड्यंत्र रचता है। ‘‘स्त्री का सुन्दर होना भी गलत हो गया। स्त्री आज भी केवल मादा देह है।’’ जिसकी स्थिति गांव से लेकर शहर तक सब जगह लगभग एक सी है। सवर्ण धर्मपाल जब अपने ही गांव की दलित लड़की फूलों को पकड़ लेता है तो वह कहता है, ‘‘हमें तो लड़की सुन्दर मिलनी चाहिए बस! जात का क्या है, मुझे तेरे से शादी थोड़े करनी है। बस कुछ देर का खेल है।’’ आज भी स्त्री को भोग की वस्तु माना जाता है, जिसके नीचे जाति, धर्म का भाव तिरोहित हो जाता है, बचती है तो सिर्फ मादा देह।
दलित समाज अशिक्षा, ग़रीबी, जागरूकता व स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में ओझा, सोखा व भगवा के जाल में फंसकर जादू-तोना, भूत-प्रेत-आत्मा पर अंधविश्वास करता है। पाखण्डी ओझा-भगत अपने ही समाज के लोगों को ठगते हैं! जो धन तो लेते ही हैं, बीमार की सांसे तक छीन लेते हैं। उनके पाखंड का पर्दाफाश तो इस उपन्यास में किया गया है किन्तु दलित समाज में कहीं भी इसके खिलाफ विरोध या जन-जागृति नहीं दिखाई गई। विक्रम स्वयं ही षड़यन्त्र को समझता है किन्तु अपने समाज को जागृत करता नहीं दिखाई देता। हां इतना अवश्य है कि लेखक अपने उपन्यास के माध्यम से अपने समाज की कमजोरियों को रखता है, आत्ममंथन करता है।
विक्रम जो कि मुख्य पात्र है, कथा का नायक है उच्च शिक्षा प्राप्त करने शहर जाता है। वहां वाल्मीकि मंदिर में अपने समाज के बच्चों को पढ़ाता है। सफ़ाई कर्मचारियों की छोटी-मोटी समस्याओं को दूर करने का प्रयास करता है, साथ ही अपने फूफा जो कि सीवर की सफ़ाई का काम करते हुए मर जाते हैं, के काम को नजदीक से समझकर, मृत्यु की पड़ताल कर अन्य लोागों को इकट्ठा करता है व सरकार से सीवर की सफ़ाई में लगे लोगों की सुरक्षा के लिए आवश्यक उपकरण की मांग करता है। सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन चलाता है। जो पूरी भी होती है। सीवर में मृत्यु की घटना को लेखक ने जिस बारीकी से रखा है, देखने योग्य है। चाहे लेखक स्वयं कभी सीवर में न उतरा हो किन्तु सकारात्मक दूरी (पाजिटिव डिस्टेंस) से संवेदना व चेतना के साथ वह घटना को प्रस्तुत करता है। सीवर की भयावता व सफ़ाई कर्मियों की जीवटता को सामने लाकर खड़ा कर देता है और पाठक भी खुले सीवर में सुब्बे सिंह व जिले सिंह के साथ उतार देता है। साथ ही एक प्रश्न भी खड़ा होता है कि इतनी वैज्ञानिक खोजों, आधुनिक यंत्रों के निर्माण के बावजूद जाम सीवर को साफ़ करने का कोई यंत्र सरकार क्यों नहं मुहैया कराती जिससे कर्मचारी को उस मौत के अंधेरे कुएं में उतरना ही न पड़े।
एक और महत्वपूर्ण घटना जो कि दलितों के विकास से गुस्साये सवर्णों द्वारा दलित बस्ती में आग लगाने की है। जिसमें पुलिस प्रशासन से लेकर आला अफसरों की मिली भगत साफ़ दिखाई देती है। जो झज्जर गोहाना, मिर्चपुर की याद दिलाती है। किन्तु दलित समाज का पढ़ा-लिखा विक्रम या अन्य गांव से शहर पलायन कर जाते हैं। क्या यह इसका सही हल होगा या सही हल की तलाश लेखक पाठकों पर छोड़ रहा है!
लेखक की सहज भाषा घटनाओं की मार्मिकता व गहनता को बढ़ा देती है। वहीं प्रसंगानुसार वह तेज धार की तरह बहुत सफ़ाई से पाखंड का खात्मा भी करती है। उदाहरण-‘‘हरामजादे, वैसे तो तुम सब हम सबसे छूत करो हो, अब कहां गई तुम्हारी छुआछूत! अब तुम्हारा धरम भरष्ट न होगा।’’
एक बिम्ब जहां बात तो कुत्तों की होती है किन्तु वह पोल हमारे समाज की खोलता है, ‘‘जब पत्तल उठाकर एक तरफ फेंके जाते तो गांव के कुत्ते पत्तलों में भिड़ जाते और ताकतवर कुत्ते दुर्बल कुत्तों से दूर भगा देते, खुद ही सब खाने की सोचते लेकिन दूर खड़े कमजोर कुत्ते भौंक-भौंक कर विरोध भी कर रहे थे। कमजोर कुत्तों में कुछ ऐसे भी दिलेर थे जो मौका देखकर ताकतवर कुत्तों में घुस जाते। मुकाबला करके कुछ ना कुछ खाना उठा लाते और एक तरफ ले जाकर खाने लगते।’’
इस उपन्यास का अंत अचानक हो जाता है जो कि कुछ अधूरा-सा जान पड़ता है। विक्रम और प्रियंका जो भिन्न जाति के हैं। विवाह तक नहीं पहुंचते लेखक केवल यही कहता है कि ऐसे विवाह से ही जाति खत्म होगी। किन्तु साथ ही लेखक एक प्रश्न भी छोड़ देता है कि, "अगर हमारे समाज के पढ़े-लिखे लड़के दूसरी जाति में विवाह करेंगे तो हमारे समाज की लड़कियां कहां जाएंगी।’’
सोनी अपने पुत्र हेमंत, जो दलित कोले का पुत्र है पर सवर्ण परिवार में पलता है, के व्यवहार से दुखी है। लेखक कहता है, ‘‘क्यों इंसानों में खून का असर नहीं, संस्कारों का असर होता है। जन्म लेते समय सब एक जैसे होते हैं, बिल्कु निश्छल, कोमल, निष्कपट, कोई दुर्भावना नहीं, कोई जाति, धर्म नहीं, बच्चें जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं, परिवार समाज के लोग यह सब सिखा देते हैं।’’
बच्चा जब पहली बार स्कूल जाता है, उसी दिन से उसे समता का पाठ पढ़ाना चाहिए। बल्कि घर बच्चे की पहली पाठशाला और मां उसकी पहली शिक्षिका, तो ये शुरुआत भी घर से होनी चाहिए। अच्छे संस्कार ही अच्छा इंसान बनाते हैं फिर जातिवाद तो सभी का दुश्मन है। यह दलितों को ही नहीं सवर्णों को भी सुख-चैन से जीने नहीं देता इसलिए सभी मिलकर ‘जातिवाद’ को खत्म करे। यही होगा शोषण पूर्ण अंधकर को खत्म करना ‘सुबह के लिए’।
उपन्यास: सुबह के लिए
लेखक: कैलाश चंद चौहान
प्रकाशक: आरोही,ए-2 /128, सैक्टर-11, रोहिणी, दिल्ली-110085.
मूल्य:100रूपये, पृष्ठ:175
प्राप्ति हेतु मोबाइल नंबर:09873134564, लेंडलाइन नंबर: 01127574095(प्रकाशक)
राकेश कुमार चौहान,
12/224, एम.सी.डी.फ्लैट, सैक्टर-20, रोहिणी,दिल्ली-110086.
मोबाइल: 9213603725
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बयान पत्रिका में प्रकाशित कैलाश चंद चौहान के उपन्यास की समीक्षा :
एक नई सुबह के लिए कैलाश चंद चौहान का उपन्यास
-राज वाल्मीकि
उपन्यास का फलक विस्तृत होता है। उसमें हम कथा के विभिन्न आयामों को प्रस्तुत करते हैं या यूं कह लीजिए कि हम कथा के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से पेश करते हैं। इसमें घटनाओं, स्थान, काल, पात्रों का भलीभंाति चित्रण किया जाता है। इससे कथानक सजीव हो उठता है। कथा का जीवन्त चित्रण उपन्यासकार की विशेषता होती है। यूं तो हर उपन्यासकार का उपन्यास लिखने का कोई न कोई उद्देश्य होता है। पर आज का दलित साहित्य विशेष मकसद से लिखा जा रहा है। यह सिर्फ साहित्य नहीं बल्कि एक आन्दोलन है जो सदियों से उत्पीडि़त, शोषित, दलित समाज के पक्ष में खड़ा है। यह भेदभाव, अन्याय एवं उत्पीड़न के विरूद्ध है। यह स्वतन्त्रता, समता, न्याय, बंधुत्व एवं मानवीय गरिमा की बात करता है। इस सन्दर्भ में कैलाश चंद चैहान का हाल ही मे लिखा उपन्यास ‘सुबह के लिए’ को लिया जा सकता है।
मेरी नजर में यह पहला उपन्यास है जो दलित लेखक द्वारा पूरी तरह वाल्मीकि समाज को केन्द्रित कर लिखा गया है। उपन्यास का फलक गांव और शहर दोनों में फैला हुआ है। कथा गांव से शुरू होती है और शहर में समाप्त। उपन्यास के शुरू में दबंग जाति की बहू सोनी के सन्तान न होने पर डाक्टरी इलाज की बजाय बाबाओं, ओझाओं और झाड़-फूंक वालों को दिखाया जाता है।
उपन्यास का कथानक हरियाणा के किसी गांव का है। यहां जातिगत भेदभाव अपनी पराकाष्ठा पर है। उदाहरण देखिए- ‘‘चूड़ों की हिम्मत तो देखो, दूल्हे को घुड़चढ़ी कराने पर उतारू हैं, कभी हुआ है ऐसा हमारे गांव में।’’ ‘‘चूड़ों का दूल्हा और घोड़ी पर इनकी इतनी जुर्रत..।’’ उपन्यास मे शादी-विवाह के दौरान होने वाले रीति-रिवाजों को भी बखूबी दर्शाया गया है। जैसे ‘‘एक जीजा खुद को होश में रखते हुए बारातियों की शराब से सेवा कर रहे थे तो दूसरे ने आतिशबाजी पर ढेर सारा रूपया खर्च कर दिया था। दूसरे दिन कंगन भी खुल गये। रिवाज के अनुसार शादी के बाद होेने वाली बलि भी देदी जो रिश्तेदार आसपास के लोग शराब पीने वाले थे उन्हें मीट की दावत के साथ शराब भी खूब पिलाई। इतना ही नहीं वाल्मीकियों की शादियों में होने वाली दावतों का सजीव एवं सटीक वर्णन किया गया है। कुछ सवर्णों की भी पोल खोली गई है जो सबके सामने तो स्वयं को शाकाहारी बताते हैं पर इन वाल्मीकियों के यहां आकर न केवल मीट खाते हैं बल्कि सूअर के मीट की तारीफ भी करते हैं।
उपन्यास वाल्मीकियों की संस्कृति/परम्पराओं/अंधविश्वासों पर भी खुलकर चर्चा करता है। कितनी विडम्बना है कि घर में व्यक्ति मरणासन्न अवस्था में पड़ा है। गरीबी, दुख की घड़ी और भगतों का शराब और मुर्गें की दावत उड़ाना यह अंधविश्वास की पराकाष्ठा है। लोग कर्ज लेकर कुरीतियां निभाने और दयनीय जिन्दगी जीने को विवश हैं। गांव के लोग किस तरह ‘उपरी हवा’, भूत-प्रेतों के चक्कर में लिप्त होते हैं इसकी विस्तार से व्याख्या की गई है। जिसकी वजह से वे कर्ज में डूबते चले जाते हैं। इन अंधविश्वासों केे कारण रिश्तेदारों में दरार पड़ जाती है। उपन्यासकार लिखता है - ‘काफी रिश्तेदारों में आपसी मनमुटाव यह भगत, ओझा ही करा देते हैं। कहेंगे कि तेरी भाभी ने या जेठ ने या किसी और ने कुछ कर रखा है। भगत, ओझा की सभी बाते सिर माथे पर। भूस्वामी और महाजन इसका जम कर फायदा उठाते हैं। इस तरह ये लोग उनके आर्थिक शोषण के शिकार हो जाते हैं।यह उपन्यास अंधविश्वासों की पोल खोलता है।
सवर्ण-समाज की अजीब बात यह है कि जब उनके यहां बच्चे पैदा होते हैं तो प्रसव कराने के लिए वे वाल्मीकि दाईयों को बुलाते हैं। वे उनके बच्चों के मुंह में उंगली भी डालती हैं। तब छुआछूत की कोई बात नहीं होती। पर जैसे ही बच्चे बड़े हो जाते हैं वे उनसे ही छुआछूत करने लगते हैं। इसी तरह जब सवर्ण इन दलित वाल्मीकि महिलाओं से अपनी हवस मिटाते हैं तब छुआछूत नहीं होती! ऐसे विरोधाभास यहां आमतौर पर देखे जा सकते हैं। उपन्यास में सोनी भूस्वामी की बहू है। उसका पति संतानोत्पत्ति में नाकाम है इसलिए वह काले नाम के वाल्मीकि से संसर्ग कर बेटे हेमन्त को जन्म देती है। काले की पत्नी फूलो बेशक ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है। पर वह जातिगत भेदभाव और शोषण का विरोध करते हुए सोनी से कहती है-‘‘ बहू जी मानती हूं तुम लोग अमीर आदमी हो, हम तुम्हारे नौकर-चाकर। इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम अपनी औलादों को तुम से पिटवा लेंगे। जितना तुम अपने बच्चों से लाड़ करना जानती हो, उतना ही हम अपने बच्चों से करते हैं।’’
इस उपन्यास में ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ एवं अपनी कविता के अलावा पूनम तुषामड़ की कविता का भी उल्लेख किया गया है। उपन्यास का नायक विक्रम शहर में अपनी बुआ के यहां आकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई करता है। वह एक जागरूक एवं समाज सुधारक युवक है। वहीं पर वह वाल्मीकि समाज के बच्चों को बहुत कम पैसों में शिक्षित करने का उपक्रम करता है जिसमें बस्ती वाले भी उसका सहयोग करते हैं। इस प्रकार वह बाबा साहब के सूत्र वाक्य ‘शिक्षा’ को सर्वाधिक महत्व देता हैं। वह कहता है कि उद्देश्य तो मेरा यह है कि बस्ती के सभी बच्चे उच्च शिक्षा तक पहुंचें। जब वे उच्च मुकाम पर पहुंचेंगे, तभी तो अपना उद्देश्य पूरा मानूंगा। वह रोजगार परक शिक्षा को महत्व देता है। विक्रम सोचता है कि ऐसा नहीं हो सकता कि मंदिर में एक स्कूल बने, बहुत कम खर्चे में रोजगार के कुछ कोर्स कराए जाएं। टेक्नीकल स्कूल भी चलाया जा सकता है।
प्रियंका नाम की गुप्ता जाति की विक्रम की सहपाठी उससे प्यार करती है। बात जब शादी की आती है तो उसके पिता जाति को प्रमुखता देते हैं। शादी-विवाहों मे जाति को प्रमुखता देने की मानसिकता को भी उपन्यास में चित्रित किया गया है। उपन्यास अन्तरजातीय विवाह का मुद्दा भी उठाता है। हमारे समाज के पढ़े-लिखे लड़के जब दूसरी जात की लड़कियों को ब्याहेंगे तो हमारे समाज की लड़कियां कहां जाएंगी?...जातिवाद खत्म करने के लिए विजातीय विवाह जरूरी है।...जैसे बहसतलब मुद्दे भी उठाये गये हैं।
उपन्यास में लोन देने वाली नगर निगम कोपरेटिव सोसायटी की हेराफेरी का पर्दाफाश कर उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को दर्शाया गया है। उपन्यास में सीवरेज वर्कर्स की नारकीय एवं खतरनाक कार्य का उल्लेख किया गया है। विक्रम के फूफा सुब्बे सिंह व उसके सहकार्यकर्ता जिले सिंह की सीवर में घुसने से मौत हो जाती है। उपन्यासकार कहता है "...इसके लिए कोई आन्दोलन नहीं करता कि सीवर में लोगों को अमानवीय तरीके से क्यों डाला जाता है। क्यों उनके लिए औजार नहीं खरीदे जाते? क्यों आधुनिक तकनीक अपनाने के बजाय इंसान को सीवर मे ढकेल दिया जाता है? क्या सफाईकर्मी इन्सान नहीं? उनके लिए आक्सीजन, गैस मास्क, सुरक्षा के लिए रस्से क्यों नहीं हैं? यूं ही लोग सीवर में मरते रहेंगे?"
एक प्रसंग में उपन्यासकार ने विक्रम के मुंह सरकार की आलोचना करते हुए कहलवाया है - "सरकार भी भेदभाव, जातिवाद को बढ़ावा देती है? क्यों न दे, उसमें भी तो ब्राह्मणवाद के पोषक लोग बैठे हैं। ठीक ही कहा जाता है कि जाति टूट गई तो हिन्दू धर्म बचेगा कहां!" उपन्यास में शहर में सफाई कार्य करने वाले वाल्मीकियो की मानसिकता को बखूबी दशार्या गया है "केवल सुबह तीन-चार घंटे काम करना, पूरे दिन आराम। यह कोई नहीं समझता कि इस काम में इज्जत नहीं है।" वाल्मीकि समाज के पिछड़े होने की एक वजह इस समाज के युवाओं का जागरूक व क्रान्तिकारी न होना भी है। उपन्यासकार लिखता है "अफसोस है कि वाल्मीकि समाज का युवा ही सोया हुआ है। बहुत से किशोर एवं युवा बिना किसी काम के गली चैराहों पर खड़े मिलते। आवाराओं की तरह रहना, पहनना उनकी आदत में शुमार था।" उपन्यास में उन लोगों का भी नोटिस लिया गया है जो वाल्मीकि समाज के लिए कुछ कर सकते हैं पर करते नहीं हैं। जो अच्छे पद पर पहुंचते ही समाज को भूल जाते हैं। यह कोई नहीं सोचता कि उनका भी कुछ कर्तव्य इस समाज के लिए है। दूसरी ओर बुराईयां गिनवाने वालों की संख्या अधिक है - बुराईयां दूर करने वालों की संख्या बेहद कम। इस समाज के कुछ नेता भी ऐसे होते हैं जो काम कम करते हैं बोलते ज्यादा हैं - वो भी बनावटी बातें, जिसका असर लोगों पर हो और उनकी नेतागिरी चमके। पहले नेता समाज सेवक हुआ करता था, आज का नेता आम जनता को लूटने के अलावा कुछ काम नहीं करता।
उपन्यास में सफाई व्यवस्था में व्याप्त व्याभिचार को दर्शाया गया है। ‘इंस्पेक्टर सुरेश गुप्ता ने हाजिरी दरोगा के पास अपनी मोटर साईकिल खड़ी की।....तभी उसका ध्यान लक्ष्मी की तरफ गया - "अरे शर्मा, यह किसका माल है?...हाय, हाय इतनी सुन्दर... बिल्कुल फिल्मी हीरोईन...तू मेरी मुलाकता करवा दे, मुलाकात का मतलब समझता है न..."
"आप भी साहब...कितनी कर्मचारियों की मुलाकात करा चुका हूं। मैं मुलाकात का मतलब नहीं समझूंगा भला? पर साहब इस बार आप मुझे मरवाओगे। कहा न, यह किसी को घास नहीं डाल...।"
जातिवादी वैमनस्य की झलक भी उपन्यास में देखने को मिलती है। जैसे -"सरकारी नौकरी लग गई है तो क्या, कहलाएगा तो चूड़े का ही।" भू-स्वामी चौधरी रणवीर सिंह ने विक्रम से कहा। उसके चेहरे व आवाज में ईर्षा के भाव साफ नजर आर रहे थे।
उपन्यास के आखिर में मिर्चपुर काण्ड को भी शामिल किया गया है। पर उपन्यास का अन्त राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर पी.डी. शर्मा के बारे में टिप्पणी से है जिसमें कहा गया है कि जब सवर्णों को दलितों के दूल्हे की घुड़चढ़ी पर आपत्ति होती है तो दलित क्यों घुड़चढ़ी करके सवर्णों को दुश्मनी मोल लेते हैं। इस पर विक्रम कहता है - "जाति के मामले में शहर और गांव के लोगों में कोई खास अन्तर नहीं है। इतना अधिक पढ़े-लिखे होेने के बावजूद प्रोफेसर पी.डी. शर्मा ने वही पिछड़ी मानसिकता का परिचय दिया, जिस तरह की मानसिकता का परिचय गांव के लोग देते हैं।"
विक्रम का मित्र सुधाकर घटना के बारे में ताजी जानकारी देते हुए कहता है- "दलित छात्रों ने क्या खुलकर विरोध किया। आखिरकार प्रोफेसर शर्मा के साथ दूसरे प्रोफेसरों को भी माफी मांगनी पड़ी। एक दलित छात्र राज तपन ढेरों छात्रों के साथ दूल्हें के रूप में सजा और घोड़ी पर बैठकर प्रोफेसर द्वारा दिए गये दलित विरोधी वक्तव्य के विरोध का ज्ञापन राजस्थान विश्वविद्यालय के उप कुलपति को सौंपा।"
"बहुत अच्छा किया। सम्मान पाने के लिए संघर्ष और जवाब देने की प्रवृति जरूरी है।" विक्रम के चेहरे पर गौरव झलक रहा था।
उपन्यास इस आशावादी सोच के साथ समाप्त होता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि दलित समाज विशेष कर वाल्मीकि समाज को ससम्मान पूरी मानवीय गरिमा के साथ जीने के लिए न केवल अपनी कमजोरियों से लड़ना है बल्कि समाज की सामंतवादी, ब्राह्मणवादी मानसिकता से भी संघर्ष करना है। इस व्यवस्था के विरूद्ध कई युद्ध लड़ने के अहसास का ये उपन्यास बोध कराता है।
उपन्यास दिए गये मुद्दों पर गंभीर चर्चा की मांग करता है। आशा है दलित समाज में यह उपन्यास अपने नये कलेवर एवं विषयवस्तु के कारण गंभीरता से लिया जाएगा। दलित वर्ग के पाठकों के लिए यह उपन्यास रोचक एवं पठनीय ही नहीं बल्कि स्वयं की सोच को दुरूस्त करने के लिए पढ़ना जरूरी है।
संपर्क: 9818482899, 36/13 ग्राउण्ड लोर, ईस्ट पटेल नगर, नई दिल्ली- 110008 |